राग - शुद्ध कल्याण

            

राग -  शुद्ध कल्याण
थाट - कल्याण
जाति - औडव - संपूर्ण
वादी - ग
संवादी -ध
स्वर - म ( तीव्र ) शेष शुद्ध
वर्जित स्वर - म नि (आरोह में)
गायन समय - रात्रि का प्रथम प्रहर
सम प्राकृतिक राग - यमन, देशकार ,भूपाली
आरोह- सा रे ग प ध नि सां
अवरोह - सां नि ध प म(तीव्र) ग रे सा
पकड़ - ग ,रे सा, नि ध प सा, ग रे प रे, सा
यह गंभीर प्रकृति का राग है इस राग का विस्तार मन्द्र और मध्य सप्तक में अधिक होता है ऐसा माना जाता है कि शुद्ध कल्याण की उत्पत्ति भूपाली और कल्याण रागो के मेल से हुई है इसीलिए कई लोग इसे भूप कल्याण कहकर भी पुकारते हैं इस राग में रे और प स्वर संगति देखने को मिलती है जो राग को विशेष रंजकता प्रदान करती है राग के आरोह में म और नि स्वरों को वर्जित किया जाता है परन्तु अवरोह में भी इनका प्रयोग अल्प ही रहता है क्योकि  अवरोह में अक्सर प से ग पर आते हुए म (तीव्र) को मींड की सहायता से ही लिया जाता  है इसके साथ नि का प्रयोग भी इस कारण से कम ही किया जाता है क्योंकि इससे राग कल्याण की छाया आने की आशंका रहती है तान प्रस्तुत करते हुए तो म स्वर को पूर्णतः छोड़ ही दिया जाता है जबकि नि स्वर का प्रयोग अवरोह में कुछ गायको द्वारा देखा जा सकता है ऐसा राग को भूपाली से भिन्न दिखने में सहायता होता है

राग - भैरवी


राग - भैरवी
थाट- भैरवी
जाति - सम्पूर्ण-सम्पूर्ण
वादी - म
सम्पूर्ण - सा
स्वर - रे ग ध नि कोमल शेष शुद्ध
गायन समय - प्रातः काल
सम प्रकृतिक राग - बिलासखानी तोड़ी
 यह अपने थाट का  आश्रय राग है इस राग के संबंध में यह कहा जाता है की इसका गायन समय प्रातः काल होने पर भी आजकल गायक इस अपनी इच्छा अनुसार किसी भी समय गाते बजाते है यह पूर्वांग वादी राग है परन्तु कुछ गायक इसका वादी स्वर म के स्थान पर प मानते है इस  सिथति में यह राग उत्तरांग वादी हो जाता है
अधिकतर कुशल गायक इस राग को गाते हुए राग की सुंदरता बढ़ने के लिए अन्य स्वरों को भी विवादी स्वरों के रूप में प्रयोग कर लिया करते है  कुछ लोग इसे गंभीर प्रकृतिक का राग मानते है  परन्तु यह राग चंचल प्रकृति का राग है क्योकि इसमें सभी 12 स्वरों को प्रयोग कर लिया जाता है और सभी 12 स्वरों का कुशल प्रयोग इस राग की चंचल प्रकृति को दर्शाता है चंचल प्रकृति के रागो में शृंगारिक रस की अधिकता होती है इस राग में तराने, ठुमरी ,टप्पा ,गजल, भजन आदि अधिक देखने को मिलते है इस राग में अधिकतर मसीतखानी गते बजाई जाती है फ़िल्मी संगीत में भी अधितर इसी राग का प्रयोग देखा जा सकता है यह भी माना जाता है की प्रत्येक संगीत की सभा का समापन इस राग के द्वारा ही देखने को मिलता है    

राग - देस


राग - देस 
थाट - खमाज
जाति - औडव -सम्पूर्ण
स्वर - दोनों नि शेष शुद्ध
वर्जित स्वर - आरोह में ग ध
गायन समय - रात्रि का दूसरा प्रहर
न्यास के स्वर -सा, रे, प 
सम प्रकृतिक राग - तिलक कामोद
आरोह - सा रे  म  प नि सां
अवरोह - सां नि ध प, म ग रे ग सा 
पकड़ - रे, म प, नि ध प , प ध प म , म रे ग सा

राग देस पूर्वांग प्रधान चंचल प्रकृति का राग है इसमें अधिकतर ठुमरिया ,गीत, ग़ज़ल, भजन व् छोटे ख्याल गए जाते है इस राग में रे स्वर पर बार बार ठहराव तथा इसका वक्र प्रयोग देखने को मिलता है आरोह में प स्वर का अलप प्रयोग किया जाता है इसके वादी तथा सम्वादी स्वर को लेकर कुछ मतभेद देखने को मिलता है कुछ लोग इस राग के वादी 'रे' सम्वादी 'प' को न मानकर प स्वर को वादी और रे स्वर को सम्वादी मानते है परन्तु यह उचित नहीं है  क्योकि यह राग पूर्वांग वादी है  और इस राग का गायन समय रात्रि का दूसरा प्रहर है जो की दिन के पूर्व अंग में आता है इसीलिए वादी स्वर पूर्वांग में और सम्वादी उत्तरांग कहना ही ठीक है  इस राग में रे s म ग रे स्वर समूह बार बार लिया जाता है अवरोह में सां से प को मींड द्वारा लिया जाता है कभी कभी कुछ कुशल गायको द्वारा दोनों नि का प्रयोग करते हुए भी देखने को मिलता है

राग - खमाज


राग - खमाज
थाट - खमाज
जाति - षाड़व -सम्पूर्ण
स्वर - दोनों नि शेष शुद्ध
वर्जित स्वर - रे
समय - रात्रि का दूसरा प्रहर
आरोह - सा, ग म , प , ध नि सां
अवरोह - सां नि ध प, म ग रे सा 
पकड़ - नि ध, म, प ध म ग
यह एक चंचल प्रकृति का राग है इस राग में ग म प नि स्वर समूह इस राग को सौंदर्य प्रधान करता है
इस राग में भजन ठुमरी ग़ज़ल  आदि गाये जाते है ठुमरी गायन अधिक प्रचलित है कभी कभी कुछ गायक ठुमरी गाते हुए आरोह में 'रे' स्वर का भी प्रयोग कर लेते है इस राग में कुछ गायक प स्वर को छोड़ते हुए ग म प नि सा स्वरों को लेकर गाते है क्योकि इस राग में प पर अधिक ठहराव नहीं किया जाता परन्तु कुछ गुणीजन ग म प नि सा स्वरसमूह का प्रयोग करके आलाप - तान लेते हुए भी देखे जा सकते है इस राग के आरोह में ध स्वर का प्रयोग भी बहुत कम किया जाता है राग खमाज अपने थाट का आश्रय राग होता है राग में आरोह के स्वर लेते हुए कई बार गायक प स्वर को छोड़ते हुए सीधा म स्वर पर चले जाते है कर्नाटकी संगीत में इस राग को हरी कांम्बोजी के नाम से जाना जाता है  

राग - जौनपुरी


राग - जौनपुरी
थाट - आसावरी
जाति - षाड़व - सम्पूर्ण
वादी  - ध
सम्वादी - ग
स्वर - ग ध नि कोमल शेष शुद्ध
वर्जित स्वर - ग आरोह में
सम्प्रकृति राग - आसावरी
गायन समय - दिन का दूसरा प्रहर
आरोह - सा रे म प नि सां
अवरोह - सां नि प म रे सा
पकड़ - म प, नि प, म प रे म प

राग जौनपुरी गंभीर प्रकृतिक का राग है इस राग के चलन तार सप्तक में अधिक है यह उत्तरांग प्रधान राग है इस राग में रे म प और प ग स्वरों की संगति बार बार देखने को मिलती है इस राग में ग स्वर पर म और ध स्वर पर नि का कण लिया जाता है यह राग आसावरी से मिलता हुआ लगता है परन्तु आरोह में नि का प्रयोग इसे

आसावरी से अलग कर देता है क्योकि आसावरी में नि को वर्जित किया जाता है इसे अलावा भी कुछ बातें दोनों को अलग करती है जैसे दोनों का गायन समय अलग अलग है आसावरी राग का गायन समय प्रातः काल है परन्तु जौनपुरी राग का गायन समय दिन का दूसरा प्रहर है दोनों में जाती की भी भिन्नता है राग आसावरी की जाति  औडव -सम्पूर्ण है जबकि राग जौनपुरी की जाती षाड़व - सम्पूर्ण है  बहुत से रागो में कुछ स्वर समूह ऐसे आ जाते है जिसे किसी अन्य राग की छाया प्रकट हो इस राग में भी म प ध नि सां -रे नि प ऐसा स्वर समूह है जिससे की राग गांधरी जो एक प्राचीन राग है का आभास होता है परन्तु उस राग में दोनों रे का प्रयोग होता  है




उत्तरी , दक्षिणी संगीत

                                                                       



प्राचीन काल में सम्पूर्ण भारत में संगीत केवल एक पद्धति थी  किन्तु आज हम देखते है की संगीत की दो पद्धतिया हो गयी है कुछ विद्वानों का मत है
 की उत्तरी संगीत पर अरब और फ़ारसी संगीत का प्रभाव पड़ा जिससे उत्तरी संगीत दक्षिणी संगीत से अलग हो गया का कहना है उनका कहना है की
16वी. शताब्दी में भारत में मुसलमानो का आगमन शुरू हुआ और धीरे धीरे वे उत्तर भारत के शाशक हो गए | अतः भारतीय संस्कृति , सभ्यता और संगीत
 पर उनकी अमिट छाप पड़ गयी परन्तु दक्षिणी भारत में कोई हस्तक्षेप न होने के कारण वहां का संगीत अपरिवर्तित रहा इस तरह हम  देखते है की उत्तरी
 और दक्षिणी इन दोनों पद्धतियो का मूल आधार एक ही है परन्तु समय के साथ कुछ बदलाव आ गए

1. उत्तर भारतीय संगीत पद्धति :-
                                              इसे हम हिंदुस्तानी संगीत पद्धति भी  कहते  है| भारत के  अधिकतर भागो में यही पद्धति प्रचलित है इस पद्धति का नाम ही  यह स्पष्ट होता है की   
यह उत्तर भारत में अधिक प्रचलन में है  भारत में यह पंजाब हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात,, जम्मू कश्मीर, उड़ीसा, आदि राज्यों क साथ अन्य भी कई राज्यों में प्रचिलित है

2. दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति :-
                        जैसा क नाम से ही स्पष्ट होता है की यही दक्षिण भारतीय राज्यों में अधिक प्रचिलित है |जैसे :-मैसूर,  आंध्रप्रदेश ,तमिलनाडु  आदि |इस पददति को हम कर्णाटकीय संगीत
पददति के नाम से भी जानते है 

दोनों पद्धतियों में समानता:--
 
1 . दोनों पद्धतियों में 12 स्वरों का प्रयोग किया जाता है और उनके स्वर स्थान भी लगभग समान है              
2 . जिस प्रकार उत्तर भारत में थाट की मान्यता है उसी प्रकार दक्षिण भारत में मेल थाट की मान्यता है
     मेल और थाट एक दूसरे क पर्यायवाची है
3 . दोनों पद्धतियों में स्वर लय और ताल  का विशेष  महत्व है 
4 . दोनों पद्धतियों में कुछ ताल भी समान है
5 . दोनों पद्धतियों के कुछ राग भी स्वर की दृष्टि से समान है और कुछ रागो के नाम भी दोनों पद्धतियों में पाए जाते है हंसध्वनि राग दोनों पद्धतियों में
   जन्य राग है और समान स्वर वाला है और अड़ाना ,श्री , धनश्री ,रजनी और दोनों पद्धतियों में पाए जाते है परन्तु इनके स्वर भिन्न होते है
   हमारे भजन ,ख्याल ,तराना और ठुमरी कर्नाटक में क्रमशः कीर्तनम ,तिल्लाना और जावली से अधिक मिलते है 
6 . दोनों पद्धतियों में गायक को अपनी कल्पना से गाने की पूरी स्वतन्त्रता रहती है किन्तु आचार- विचार का अंतर होने के कारण कल्पना करने का ढंग अलग है 

 दोनों में भिन्नताएं:-

1 . यधपि दोनों पद्धतियों में 12 स्वर होते है फिर भी कुछ स्वरों के नाम भिन्न भिन्न है उत्तर भारतीय संगीत
      पद्धति के कोमल स्वर रे और ध दक्षिण  भारतीय संगीत पद्धति में शुद्ध रे ,ध के नाम से  जाते है और ये शुद्ध 
      नई को ककली निषाद कहते है
2 . उत्तर भारतीय संगीत  में 10 थाट है और दक्षिण भारतीय संगीत में 19  थाट माने जाते है
3 . दक्षिण भारतीय संगीत में कठोर बंधन है की यहा की बंदिशों में कोई परिवर्तन नहीं लाया जा सकता
      यह बंदिश की मौलिकता पर अधिक ध्यान दिया जाता है परन्तु उत्तर भारत में ऐसे कठोर नियम नहीं
      है यह गायक    
      बंदिश में अपनी इच्छा अनुसार परिवर्तन कर सकते है
4 . उत्तर भारत में ताल के लिए तबला और दक्षिण भारत में ताल के लिए मृदंगम प्रयुक्त होता है .
5 . उत्तर भारतीय संगीत  में स्वर की सिथिरता और गंभीरता पर विशेष ध्यान  दिया जाता है और दक्षिण
       भारतीय संगीत  में स्वर के कंपन और चंचलता पर अधिक ध्यान दिया जाता है
6 . दक्षिण  भारतीय संगीत  में यह प्राचीन नियम है के गायक गांय के बिच में मृदंग बजानी वाले को अपनी  
       कला के प्रदर्शन का समय देते है परन्तु उत्तरी  भारतीय संगीत  में तबले का प्रयोग संगीत को सुंदर
       बनाने   
       के लिए किया जाता है तबलियो को अपनी कला का परिचय देने के लिए अलग से समय दे दिया जाता है 
       जिसे स्वतंत्र वादन कहा जाता है   

राग पूर्वी






राग - पूर्वी

थाट - पूर्वी

जाति - सम्पूर्ण - सम्पूर्ण

वादी - ग

सम्वादी - नि

स्वर - रे ध कोमल म तीव्र शेष शुद्ध

न्यास के स्वर - सा ग प

गायन समय - सांयकाल

सम प्रकृतिक राग - पुरिया





राग पूर्वी गंभीर प्रकृतिक का राग है इस राग का चलन मन्द्र और मध्य सप्तकों में अधिक होता है यह अपने

थाट का आश्रय राग है इस राग में बड़े ख्याल ,छोटे ख्याल ,व् गतो को मींड ,कण , मुरकी आदि का खूब प्रयोग देखने को मिलता है आरोह करते हुए इस राग में अधिकतर प स्वर को छोड़ दिया जाता है आरोह में केवल तीव्र म का प्रयोग होता है परन्तु अवरोह में दोनों म (शुद्ध और तीव्र ) का प्रयोग होता है दो ग के बिच में म ( ग म ग ) स्वर का प्रयोग राग में सुंदरता से किया जाता है इस राग में सा ग प स्वरों का प्रयोग पर राग की विचित्रता निर्भर करती है 

राग की जातिया

                                                                                
 
  राग की जातिया

किसी राग की जाति से हमे यह पता चलता है की सम्बन्धित राग में कितने स्वरों का प्रयोग किया जाता है
राग की जाती राग के आरोह व अवरोह में प्रयोग किये जाने वाले स्वरों पर निर्भर करती है इसी आधार पर राग की तीन जातीय होती  है

1. औडव
2. षाड़व
3. सम्पूर्ण
 
औडव:-
          जिस राग में केवल पांच स्वरों का ही प्रयोग किया जाता है वह राग औडव जाती के राग कहलाते है
 षाड़व:-
           जिस राग में छःस्वरों का प्रयोग किया जाता है उसको षाड़व जाती का राग कहते है
सम्पूर्ण:-
            जिस राग में  सभी सातो स्वरों का प्रयोग किया जाता है उसको सम्पूर्ण जाती का राग कहते है

 यह जानने के पश्चात हमारा यह जान लेना भी आवश्यक है कि कुछ राग ऐसे भी है  जिनके आरोह में अलग तथा अवरोह में अलग स्वरों का प्रयोग होता हे ऐसे में इन तीन जातियों से तीन तीन उपजातिया बनाई गयी  जो इस प्रकार है


औडव

औडव-औडव:--
                         जब  राग के आरोह में  पांच और अवरोह में भी पांच स्वरों  का प्रयोग किया जाता है
                         तो उसे औडव-औडव जाती का राग कहा जाता है

औडव-षाड़व:-
                      जब राग के  आरोह में पांच और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते है तो उसे
                         औडव-षाड़व जाती का राग कहते है
 
औडव-सम्पूर्ण:-
                           जब राग के आरोह में पांच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है तो उसे 
                           औडव-सम्पूर्ण जाती का राग कहते है

षाड़व

षाड़व-औडव:-
                       जब राग में आरोह में छः स्वर और अवरोह  में पाँच स्वरों  का  प्रयोग  किया जाता है
                      तो उसे षाड़व--औडव जाती का राग कहा जाता है

षाड़व-षाड़व:--
                        जब राग में आरोह में छः और अवरोह में भी छः स्वरों का प्रयोग किया जाता है तो उस
                        राग को षाड़व-षाड़व जाती का राग कहा जायेगा 

षाड़व-सम्पूर्ण :--
                            जब राग में आरोह में छः और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग किया जायेगा तो उस
                            राग को षाड़व-- सम्पूर्ण जाती का राग कहा जायेगा


सम्पूर्ण

सम्पूर्ण -औडव:--
                            जिस राग के आरोह में सात और अवरोह में पाँच स्वरों का प्रयोग किया जाता है उस राग को                              सम्पूर्ण-औडव  जाती का राग कहा जाता है 

सम्पूर्ण-षाड़व:-
                         जिस राग के आरोह में सात और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते है उस राग को
                         सम्पूर्ण --षाड़व जाती का राग कहते है

सम्पूर्ण -सम्पूर्ण :-
                               जिस राग के आरोह में सात और अवरोह में भी सात ही स्वरों  का प्रयोग किया
                                जाता है उस  राग को सम्पूर्ण-- सम्पूर्ण  जाती का राग कहा जाता है










राग वृंदावनी सारंग


राग - वृंदावनी सारंग

राग - काफी
जाति - औडव-औडव 
वादी - रे
संवादी - प
स्वर - दोनों नि
वर्जित स्वर - ग ध
न्यास के स्वर - रे प सा
समय - दिन का दूसरा प्रहर
सम प्राकृतिक राग - सूर मल्हार, मेघ मल्हार
आरोह - नि सा, रे म प, नि सा
अवरोह - सां नि प, म रे, सा
पकड़ - नि सा रे म रे प म रे सा
           राग वृंदावनी सारंग बहुत ही मधुर और लोकप्रिय राग है इसे केवल सारंग के नाम से भी जाना जाता है इस राग में रे स्वर का बहुत्व मिलता है अर्थात इस स्वर पर अधिक न्यास किया जाता है इसका गायन करते समय आरोह में शुद्ध नि तथा अवरोह में कोमल नि का प्रयोग किया जाता है सारंग के अनेक प्रकार पाए जाते हैं जैसे लंका दहन सारंग, मियां की सारंग, शुद्ध सारंग, मधुमाद सारंग आदि इसके कई प्रकार प्रचलित हैं इसके सभी प्रकारों में रे स्वर का बहुत्व देखने को मिलता है

राग का अर्थ

                                                                                   
    राग का अर्थ हे आनंद देना ,राग वह सुंदर रचना होती है जो हमारे कानो को सुनने में अच्छी लगे, जब कम से कम पांच और अधिक से अधिक सात स्वरो की रचना को कुछ नियमो का पालन करते हुए ताल बृद्ध करके गाया बजाय जाता है तो वह  मधुर रचना को रचना राग कहलाती है |
 किसी भी राग में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य होते है जो उस राग को उसकी  पहचान प्रदान करते है या यह भी कह सकते है कि उस राग को अन्य रागो से अलग पहचान प्रदान करते है जिस प्रकार एक थाट से अनेक राग उत्पन्न होते है उसी प्रकार एक राग से अनेको गीतों की रचना की जा सकती है संगीत में एक राग को दूसरे राग से अलग पहचान प्रदान करने वाले कुछ महत्वपूर्ण अंग इस प्रकार है
आरोह
          स्वरों के ऊपर की दिशा में चढ़ते  हुए क्रम को आरोह कहते है
अवरोह
          स्वरों के उतरते हुए  क्रम को आरोह  क्रम कहते है
पकड़ 
          वह स्वर समूह जो किसी राग की पहचान करवाता है उसे पकड़ कहते है 

वादी स्वर
          किसी राग के वादी स्वर वो होते है जो उस राग में सब से अधिक गाये बजाये जाते है|

सम्वादी           
          सम्वादी स्वर वो स्वर होते है जो वादी से कम  परन्तु अन्य स्वरों से अधिक गए बजाए जाते है

अनुवादी
          अनुवादी ये स्वर  वः स्वर होते हे जो वादी और सम्वादी के बाद बचे हुए स्वर होती है

विवादी
          विवादी स्वर वो स्वर होती है जो राग में प्रयोग नहीं किये जाते परन्तु यह स्वर राग में वर्जित भी नहीं
          होते, इसलिए  कभी कभी कुछ संगीतकार इन स्वरों का प्रयोग राग में सुंदरता व रंजकता बढ़ाने  के लिए

           कर लेते है

न्यास के स्वर
            जिन स्वरों पर किसी राग में बार बार व अधिक देर तक ठहराव होता है  वे स्वर उस राग के न्यास
              के स्वर होते है

वर्जित स्वर
              ये व स्वर है जो किसी राग में बिलकुल भी प्रयोग नहीं किये जाते जिनके प्रयोग से राग के स्वरूप
             के बिगड़ने का खतरा रहता है क्योकि कुछ रागो में कुछ स्वरों का प्रयोग करनी से वो किसी अन्य
             राग का रूप ले लेते है 

वक्र स्वर

            जब राग में स्वरों को सीधे आरोह में या अवरोह क्रम में न गाकर  टेढ़े मेढ़े गाये व बजाए जाता है तो वे
             स्वर वक्र स्वर कहलाते है इन प्रकार के स्वरों का प्रयोग जिन रागो में किया जाता है उन रागो को
             वक्र चलन के राग कहते है
     

कजरी




कजरी एक लोकप्रिय गीत है जो उत्तर प्रदेश के पूर्वी भागों में अधिक पाया जाता है  इसे कजली के नाम से भी जाना जाता है कजरी में अधिकतर वर्षा ऋतु , विरह गीत , राधा कृष्ण की लीलाओं का वर्णन देखने को मिलता है इसमें श्रृंगार रस की प्रधानता होती है कजरी को कजली नाम से भी जाना जाता है कजरी का गायन पुरुषों और महिलाओं दोनों के द्वारा किया जाता है महिलाएं जब समूह में इसे प्रस्तुत करते हैं तो उसे ढूनमुनियाॅ कजरी कहते हैं पुरुषों की कजरी अलग प्रकार की होती है उनके प्रस्तुत करने का ढंग अलग होता है कजरी का कजरी सावन के महीने में त्यौहारों जैसे तीज रक्षाबंधन आदि सावन के महीने में होता है एनरिक कजरी ऐसे देखने सुनने को मिलती है जब नव विवाहिता अपने पीहर रहने को आती है और अपने भाभी और सखियों के संग झूला झूलते हुए मिलकर कजरी का गायन करती हैं
           मिर्जापुर से बनारस की कजरी बहुत प्रसिद्ध है दोनों का अपना अलग-अलग रंग है कजरी का संबंध एक धार्मिक तथा सामाजिक पर्व से भी जुड़ा है भादो के कृष्ण पक्ष की तृतीया को कजरी व्रत पर्व मनाया जाता है यह स्त्रियों का मुख्य त्यौहार है इस दिन सभी स्त्रियां नए वस्त्र और आभूषण पहनकर कजरी देवी की पूजा करती है और अपने भाइयों को 'जई' बांधने को देती है इस दिन व qwह रतजगा करके सारी रात कजरी गाती है

संगीत की उत्पत्ति





यदि साधारण शब्दों में कहा जाये तो अपनी भावनाओ को हम नाच गा कर या बजा कर करते  है | इस प्रकार गायन वादन व नृत्य के माध्यम से अपनी भावनाओ की अभिव्यक्ति को कला को हम संगीत कहते है | संगीत शब्द की उत्पत्ति "गीत" शब्द में सम शब्द को लगा कर मानी गयी है | यद्पि इन तीनो कलाओ का अपना अलग अस्तित्व है फिर भी यह किसी न किसी रूप में एक दूसरे को प्रभावित करते  है | अन्य शब्दों में गायन, वादन व नृत्य के समावेश को संगीत कहते है | संगीत में तीनो कलाओ में गायन को प्रधान मना जाता है, क्योंकी नृत्य वादन के आधीन है और वादन ,गायन के आधीन है| 
संगीत एक ऐसी कला है जो पाँचो कलाओ ( वस्तुकला ,चित्रकला, मूर्तिकला  ,काव्यकला  व् संगीतकला  ) में सबसे अधिक प्राचीन कला है | संगीत कला प्रचलन तो  कुछ  सालो से  नहीं अपितु आदि काल से  ही  है |.
प्राचीन काल में भी संगीत मानव जीवन का एक अभिन्नं अंग था जब मानव ने बोलना भी नहीं सिखा था संगीत का अस्तित्व तो उससे भी पहले से है  
प्राचीन काल  में  भी मानव अपने मन के भावो को नाचकर या गुनगुना कर प्रकट करते थे  
           संगीत  के  इतिहास  में  यह  कहना  अनुचित  न  होगा  की संगीत  का  अस्तित्व पृथ्वी  पर उतना  ही  पुराना है  जितना  पुराना जीवन ,...क्योकि  संगीत तो तभी से ही पृथ्वी  पर विधमान है जब  से  यहाँ  पर  जीवन  उत्पन्न  हुआ  .
संगीत इस सृष्टि के कण कण में व्याप्त है | चिडिओ का एक स्वर में चेहेकना , झरनो का गिरने से उत्तपन ध्वनि , भवरो की गुंजन सुनते है तो स्वय को कभी  कभी कितना आनंद विभोर  पाते है 
किसी  के कंठ से निकली मधुर आवाज, .. ये सभी मधुर ध्वनिया मिल कर एक मधुर संगीत का रूप धारण कर लेती  है जो हमारे मन को कभी शांति ,तो कभी मनोरंजन तो कभी रोमांच से भर देती है | संगीत का ही रूप है
वैसे संगीत उतना ही प्राचीन है जितना जीवन फिर भी विभिन्न धर्मो व विचारधाराओ के अनुसार संगीत क उत्पत्ति विषय  में अनेक मत पाए जाते है उदाहरण के लिए एक मान्यता के आधार पर संगीत  की उत्पत्ति का श्र्य देवी  देवताओ को दिया जाता है
यही कहा जाता है की ब्रहा जी ने सृष्टि के निर्माण के पश्चात् यह कला भगवान शिव को प्रदान की और भगवान शिव से फिर यह कला माँ सरस्वती ने प्राप्त की
इसके पश्चात्  नारद जी ने माता सरस्वती से यह विद्या प्राप्त की व इसका प्रचार प्रसार देवलोक व पृथ्वी  लोक पर अन्य ऋषियों की सहायता से किया 
इस प्रकार संगीत की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक मान्यता यह भी है के... एक फ़ारसी विद्वान ने संगीत की उत्पत्ति का कारन एक पक्षी को बताया है जिसका नाम मुसिकार है जो पहाड़ी क्षेत्र का पक्षी है 
कुछ विद्वानों के मत अनुसार संगीत शब्द की उतपत्ती "ओउम '"शब्द से हुई है. इसी प्रकार अन्य और कई मान्यताये है जो संगीत के क्षेत्र की व्यापकता और इतिहास से जुड़े है संगीत मानव जीवन के हर क्षेत्र को प्रभवित करता हैं

   


सप्तक



एक सप्तक तीन प्रकार के होते है प्रत्येक सप्तक सात स्वरों का बना होता है और प्रत्येक सप्तक एक दूसरे से अलग होता है एक ही स्वर की आवाज एक सप्तक
 में अलग तथा दूसरे सप्तक में अलग होती है  अर्थात एक सप्तक दूसरे सप्तक से उचा या निचा होता है  इस प्रकार संगीत में सप्तकों की संख्या तीन होती है और
 इनकी अलग पहचान  है लिए कुछ चिन्हो का प्रयोग किया जाता है जिससे यह पहचान हो  सके की सम्बन्धित स्वर कौन से सप्तक का है               
सप्तक तीन प्रकार के होते है
सप्तक तीन प्रकार  निम्नलिखित  है
1. मन्द्र सप्तक
2. मध्य सप्तक
3. तार सप्तक 
 1. मन्द्र  सप्तक
-
                 जिन स्वरों का गायन साधारण आवाज से नीची आवाज में किया जाता है वे स्वर मन्द्र सप्तक के स्वर होते है
     इन स्वरों के गायन से ह्रदय पर जोर पड़ता है  मन्द्र सप्तक के स्वरों को बताने के लिए स्वरों के निचे एक बिंदु लगाई जाती है
     जैसे :- नि ध प ध ~~सा

2.मध्य सप्तक :-
                    जैसे की नाम से स्पष्ट है की मध्य यानि बीच की आवाज, जो न अधिक ऊँची हो और न अधिक नीची |इन स्वरों को गाने पर अधिक जोर नहीं लगाना पड़ता
            | इन स्वरों को अपनी साधारण आवाज में आसानी से गाय जा सकता है इन स्वरों को बतानी और दिखानी के लिए किसी प्रकार के चिन्ह  लगाने  की आवश्यकता नहीं होती जैसे :- सा रे प |
   
3.तार सप्तक :-
                  तार सप्तक में स्वर साधारण आवाज से उची आवाज में गाये जाते  है इन स्वरों  के  गायन से मस्तिष्क  पर जोर पड़ता है इन स्वरों की आवाज मध्य सप्तक से दुगनी ऊँची होती है
             इन स्वरों की पहचान के लिए स्वरों के ऊपर  एक बिंदु लगाई जाती है उदाहरण के लिए रे, ग ,
सप्तक में सात स्वर होते है ,सा  से लेकर  नि तक  इन सात स्वरों के समूह को सप्तक कहते  है