राग वृंदावनी सारंग


राग - वृंदावनी सारंग

राग - काफी
जाति - औडव-औडव 
वादी - रे
संवादी - प
स्वर - दोनों नि
वर्जित स्वर - ग ध
न्यास के स्वर - रे प सा
समय - दिन का दूसरा प्रहर
सम प्राकृतिक राग - सूर मल्हार, मेघ मल्हार
आरोह - नि सा, रे म प, नि सा
अवरोह - सां नि प, म रे, सा
पकड़ - नि सा रे म रे प म रे सा
           राग वृंदावनी सारंग बहुत ही मधुर और लोकप्रिय राग है इसे केवल सारंग के नाम से भी जाना जाता है इस राग में रे स्वर का बहुत्व मिलता है अर्थात इस स्वर पर अधिक न्यास किया जाता है इसका गायन करते समय आरोह में शुद्ध नि तथा अवरोह में कोमल नि का प्रयोग किया जाता है सारंग के अनेक प्रकार पाए जाते हैं जैसे लंका दहन सारंग, मियां की सारंग, शुद्ध सारंग, मधुमाद सारंग आदि इसके कई प्रकार प्रचलित हैं इसके सभी प्रकारों में रे स्वर का बहुत्व देखने को मिलता है

राग का अर्थ

                                                                                   
    राग का अर्थ हे आनंद देना ,राग वह सुंदर रचना होती है जो हमारे कानो को सुनने में अच्छी लगे, जब कम से कम पांच और अधिक से अधिक सात स्वरो की रचना को कुछ नियमो का पालन करते हुए ताल बृद्ध करके गाया बजाय जाता है तो वह  मधुर रचना को रचना राग कहलाती है |
 किसी भी राग में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य होते है जो उस राग को उसकी  पहचान प्रदान करते है या यह भी कह सकते है कि उस राग को अन्य रागो से अलग पहचान प्रदान करते है जिस प्रकार एक थाट से अनेक राग उत्पन्न होते है उसी प्रकार एक राग से अनेको गीतों की रचना की जा सकती है संगीत में एक राग को दूसरे राग से अलग पहचान प्रदान करने वाले कुछ महत्वपूर्ण अंग इस प्रकार है
आरोह
          स्वरों के ऊपर की दिशा में चढ़ते  हुए क्रम को आरोह कहते है
अवरोह
          स्वरों के उतरते हुए  क्रम को आरोह  क्रम कहते है
पकड़ 
          वह स्वर समूह जो किसी राग की पहचान करवाता है उसे पकड़ कहते है 

वादी स्वर
          किसी राग के वादी स्वर वो होते है जो उस राग में सब से अधिक गाये बजाये जाते है|

सम्वादी           
          सम्वादी स्वर वो स्वर होते है जो वादी से कम  परन्तु अन्य स्वरों से अधिक गए बजाए जाते है

अनुवादी
          अनुवादी ये स्वर  वः स्वर होते हे जो वादी और सम्वादी के बाद बचे हुए स्वर होती है

विवादी
          विवादी स्वर वो स्वर होती है जो राग में प्रयोग नहीं किये जाते परन्तु यह स्वर राग में वर्जित भी नहीं
          होते, इसलिए  कभी कभी कुछ संगीतकार इन स्वरों का प्रयोग राग में सुंदरता व रंजकता बढ़ाने  के लिए

           कर लेते है

न्यास के स्वर
            जिन स्वरों पर किसी राग में बार बार व अधिक देर तक ठहराव होता है  वे स्वर उस राग के न्यास
              के स्वर होते है

वर्जित स्वर
              ये व स्वर है जो किसी राग में बिलकुल भी प्रयोग नहीं किये जाते जिनके प्रयोग से राग के स्वरूप
             के बिगड़ने का खतरा रहता है क्योकि कुछ रागो में कुछ स्वरों का प्रयोग करनी से वो किसी अन्य
             राग का रूप ले लेते है 

वक्र स्वर

            जब राग में स्वरों को सीधे आरोह में या अवरोह क्रम में न गाकर  टेढ़े मेढ़े गाये व बजाए जाता है तो वे
             स्वर वक्र स्वर कहलाते है इन प्रकार के स्वरों का प्रयोग जिन रागो में किया जाता है उन रागो को
             वक्र चलन के राग कहते है
     

कजरी




कजरी एक लोकप्रिय गीत है जो उत्तर प्रदेश के पूर्वी भागों में अधिक पाया जाता है  इसे कजली के नाम से भी जाना जाता है कजरी में अधिकतर वर्षा ऋतु , विरह गीत , राधा कृष्ण की लीलाओं का वर्णन देखने को मिलता है इसमें श्रृंगार रस की प्रधानता होती है कजरी को कजली नाम से भी जाना जाता है कजरी का गायन पुरुषों और महिलाओं दोनों के द्वारा किया जाता है महिलाएं जब समूह में इसे प्रस्तुत करते हैं तो उसे ढूनमुनियाॅ कजरी कहते हैं पुरुषों की कजरी अलग प्रकार की होती है उनके प्रस्तुत करने का ढंग अलग होता है कजरी का कजरी सावन के महीने में त्यौहारों जैसे तीज रक्षाबंधन आदि सावन के महीने में होता है एनरिक कजरी ऐसे देखने सुनने को मिलती है जब नव विवाहिता अपने पीहर रहने को आती है और अपने भाभी और सखियों के संग झूला झूलते हुए मिलकर कजरी का गायन करती हैं
           मिर्जापुर से बनारस की कजरी बहुत प्रसिद्ध है दोनों का अपना अलग-अलग रंग है कजरी का संबंध एक धार्मिक तथा सामाजिक पर्व से भी जुड़ा है भादो के कृष्ण पक्ष की तृतीया को कजरी व्रत पर्व मनाया जाता है यह स्त्रियों का मुख्य त्यौहार है इस दिन सभी स्त्रियां नए वस्त्र और आभूषण पहनकर कजरी देवी की पूजा करती है और अपने भाइयों को 'जई' बांधने को देती है इस दिन व qwह रतजगा करके सारी रात कजरी गाती है

संगीत की उत्पत्ति





यदि साधारण शब्दों में कहा जाये तो अपनी भावनाओ को हम नाच गा कर या बजा कर करते  है | इस प्रकार गायन वादन व नृत्य के माध्यम से अपनी भावनाओ की अभिव्यक्ति को कला को हम संगीत कहते है | संगीत शब्द की उत्पत्ति "गीत" शब्द में सम शब्द को लगा कर मानी गयी है | यद्पि इन तीनो कलाओ का अपना अलग अस्तित्व है फिर भी यह किसी न किसी रूप में एक दूसरे को प्रभावित करते  है | अन्य शब्दों में गायन, वादन व नृत्य के समावेश को संगीत कहते है | संगीत में तीनो कलाओ में गायन को प्रधान मना जाता है, क्योंकी नृत्य वादन के आधीन है और वादन ,गायन के आधीन है| 
संगीत एक ऐसी कला है जो पाँचो कलाओ ( वस्तुकला ,चित्रकला, मूर्तिकला  ,काव्यकला  व् संगीतकला  ) में सबसे अधिक प्राचीन कला है | संगीत कला प्रचलन तो  कुछ  सालो से  नहीं अपितु आदि काल से  ही  है |.
प्राचीन काल में भी संगीत मानव जीवन का एक अभिन्नं अंग था जब मानव ने बोलना भी नहीं सिखा था संगीत का अस्तित्व तो उससे भी पहले से है  
प्राचीन काल  में  भी मानव अपने मन के भावो को नाचकर या गुनगुना कर प्रकट करते थे  
           संगीत  के  इतिहास  में  यह  कहना  अनुचित  न  होगा  की संगीत  का  अस्तित्व पृथ्वी  पर उतना  ही  पुराना है  जितना  पुराना जीवन ,...क्योकि  संगीत तो तभी से ही पृथ्वी  पर विधमान है जब  से  यहाँ  पर  जीवन  उत्पन्न  हुआ  .
संगीत इस सृष्टि के कण कण में व्याप्त है | चिडिओ का एक स्वर में चेहेकना , झरनो का गिरने से उत्तपन ध्वनि , भवरो की गुंजन सुनते है तो स्वय को कभी  कभी कितना आनंद विभोर  पाते है 
किसी  के कंठ से निकली मधुर आवाज, .. ये सभी मधुर ध्वनिया मिल कर एक मधुर संगीत का रूप धारण कर लेती  है जो हमारे मन को कभी शांति ,तो कभी मनोरंजन तो कभी रोमांच से भर देती है | संगीत का ही रूप है
वैसे संगीत उतना ही प्राचीन है जितना जीवन फिर भी विभिन्न धर्मो व विचारधाराओ के अनुसार संगीत क उत्पत्ति विषय  में अनेक मत पाए जाते है उदाहरण के लिए एक मान्यता के आधार पर संगीत  की उत्पत्ति का श्र्य देवी  देवताओ को दिया जाता है
यही कहा जाता है की ब्रहा जी ने सृष्टि के निर्माण के पश्चात् यह कला भगवान शिव को प्रदान की और भगवान शिव से फिर यह कला माँ सरस्वती ने प्राप्त की
इसके पश्चात्  नारद जी ने माता सरस्वती से यह विद्या प्राप्त की व इसका प्रचार प्रसार देवलोक व पृथ्वी  लोक पर अन्य ऋषियों की सहायता से किया 
इस प्रकार संगीत की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक मान्यता यह भी है के... एक फ़ारसी विद्वान ने संगीत की उत्पत्ति का कारन एक पक्षी को बताया है जिसका नाम मुसिकार है जो पहाड़ी क्षेत्र का पक्षी है 
कुछ विद्वानों के मत अनुसार संगीत शब्द की उतपत्ती "ओउम '"शब्द से हुई है. इसी प्रकार अन्य और कई मान्यताये है जो संगीत के क्षेत्र की व्यापकता और इतिहास से जुड़े है संगीत मानव जीवन के हर क्षेत्र को प्रभवित करता हैं

   


सप्तक



एक सप्तक तीन प्रकार के होते है प्रत्येक सप्तक सात स्वरों का बना होता है और प्रत्येक सप्तक एक दूसरे से अलग होता है एक ही स्वर की आवाज एक सप्तक
 में अलग तथा दूसरे सप्तक में अलग होती है  अर्थात एक सप्तक दूसरे सप्तक से उचा या निचा होता है  इस प्रकार संगीत में सप्तकों की संख्या तीन होती है और
 इनकी अलग पहचान  है लिए कुछ चिन्हो का प्रयोग किया जाता है जिससे यह पहचान हो  सके की सम्बन्धित स्वर कौन से सप्तक का है               
सप्तक तीन प्रकार के होते है
सप्तक तीन प्रकार  निम्नलिखित  है
1. मन्द्र सप्तक
2. मध्य सप्तक
3. तार सप्तक 
 1. मन्द्र  सप्तक
-
                 जिन स्वरों का गायन साधारण आवाज से नीची आवाज में किया जाता है वे स्वर मन्द्र सप्तक के स्वर होते है
     इन स्वरों के गायन से ह्रदय पर जोर पड़ता है  मन्द्र सप्तक के स्वरों को बताने के लिए स्वरों के निचे एक बिंदु लगाई जाती है
     जैसे :- नि ध प ध ~~सा

2.मध्य सप्तक :-
                    जैसे की नाम से स्पष्ट है की मध्य यानि बीच की आवाज, जो न अधिक ऊँची हो और न अधिक नीची |इन स्वरों को गाने पर अधिक जोर नहीं लगाना पड़ता
            | इन स्वरों को अपनी साधारण आवाज में आसानी से गाय जा सकता है इन स्वरों को बतानी और दिखानी के लिए किसी प्रकार के चिन्ह  लगाने  की आवश्यकता नहीं होती जैसे :- सा रे प |
   
3.तार सप्तक :-
                  तार सप्तक में स्वर साधारण आवाज से उची आवाज में गाये जाते  है इन स्वरों  के  गायन से मस्तिष्क  पर जोर पड़ता है इन स्वरों की आवाज मध्य सप्तक से दुगनी ऊँची होती है
             इन स्वरों की पहचान के लिए स्वरों के ऊपर  एक बिंदु लगाई जाती है उदाहरण के लिए रे, ग ,
सप्तक में सात स्वर होते है ,सा  से लेकर  नि तक  इन सात स्वरों के समूह को सप्तक कहते  है

स्वर



साधारण रूप में कहा जाये तो  हम जो आवाजे अपने  आस पास सुनते  है वह विभिन्न प्रकार की ध्वनि ही है  
परन्तु संगीत में ध्वनि से अभिप्राय उस ध्वनि से है जो हमारे कानो को सुनने मेंजो मधुर व कर्णप्रिय हो जिससे सुनने से हमारे कानो को अच्छा अनुभव हो
दैनिक जीवन में हम अनेक आवाजे सुनते है जानवरो पक्षियों की आवाजे  बच्चो के हसनी या रोनी की आवाजे ,किसी के  चिल्लाने की आवाजे तथा किसी के गाने  की आवाजे | ये सभी ध्वनिया ही तो है
 , परन्तु अलग अलग रूप में विद्धमान है . हम इन सभी ध्वनियों को संगीत तो  नहीं कह सकते क्योकि संगीत में तो वही ध्वनि उपयोगी है जो मधुर हो . ध्वनि की उतपत्ति आघात के कारण होतीं है
 जब किसी वस्तु पर किसी अन्य वस्तु या साधन क द्वारा आघात किया जाता है तो उनके  टकराव द्वारा कुछ तरंगे (विब्रेशन्स) उत्तपन होतीं है जिनसे ध्वनि उत्तपन होती है इन ध्वनि तरंगो को हम संगीत में आंदोलन भी कहते  है ,                   स्वरा
 स्वर वह ध्वनि है जिसकी एक नियमित आंदोलन संख्या है पतंजलि ऋषि ने भी स्वर के विषय में कहा है कि 
                                "स्वम्  राजन्ते इति स्वरा "
अर्थात 'स्वर 'वह है जो स्वय  विराजित होते है  स्वर के विषय में यह  भी कह सकते  है कि जब ध्वनि के निश्चितः आंदोलन के साथ उतपन्न होतीं है तो यह एक स्वर के  रूप में उत्पन होतीं है |
परन्तु यदि यही ध्वनि के अनिश्चित व अनियमित रूप[ में होतीं है तो यही शोर का रूप ले लेती है इन ध्वनि तरंगो से असंख्य नाद उत्पन होते है  संगीत में 12 स्वर होते  है ,जिनमे से 7 शुद्ध व 5  विकृत स्वर होते  है 
इन सात शुद्ध स्वरों के बीच 22 श्रुतिया विद्धमान  होतीं है , इन 22 श्रुतियो क बीच असंख्य नाद होते  है , इन 22  श्रुतियो में से जो श्रुतिया एकदम साफ़ साफ़ पहचानी जा सकती ह उन पर स्वरों कि स्थापना  की गयी है |
स्वरों के बीच में  यह श्रुतिया एक निश्चित अंतराल के बाद स्थापित होतीं है | जिन श्रुतियो में मधुरता  और ठहराव होता हे वही स्वर कहलाती है|

  
                                                                                                           स्वर
                                                                 शुद्ध ----------------------------|-----------------------विकृत
                                                              (सा , पा)                                                     |----------|----------|
                                                                                                                                 कोमल            तीव्र      
                                                                                                                          (रे,ग,ध,नि)               (म)

संगीत में हम इन सात स्वरों को इन नामो से जानते  है|
सा -षडज
रे -ऋषभ
गा-गंधार
म- मध्यम
पा -पंचम
ध-धजिन श्रुतियो में मधुरता  और ठहराव होता हे वही स्वर कहलाती है|
                                     स्वर
शुद्ध ----------------------------|-----------------------विकृत
 (सा , पा)                                                   |----------|----------|
                                                         कोमल                         तीव्र              
                                                       (रे,ग,ध,नि)                     (म)

संगीत में हम इन सात स्वरों को इन नामो से जानते  है|
सा -षडज
रे -ऋषभ
गा-गंधार
म- मध्यम
पा -पंचम
ध -धैवत 
नि-निषाद

 

नाद



ध्वनि के उत्पन्न होनी की प्रक्रिया में वायु दबाव के कारण या वायु प्रवाह क द्वारा एक कम्पन अर्थात आंदोलन उत्पन्न होता है यही पर  नाद की उत्पत्ती होती है
जब ध्वनि उत्पन्न होती है तो यह आंदोलन संख्या कभी नियमित रूप से सिथिर तो कभी अनियमित रूप से अनिश्चित व अस्थिर  होती है
परन्तु संगीत उपयोगी नाद वही होता है जो ध्वनि सुनने में मधुर तथा संगीत उपयोगी हो
जिस ध्वनि की संख्या सिथिर नहीं होती वह ध्वनि संगीत उपयोगी नाद नहीं कहलाती |
नाद ध्वनि के  अंदर एक निश्चित समय में   एक मात्रा से दूसरी मात्रा के  बीच के अंतर में  ही स्थापित होता है ये  एक मात्रा से दूसरी मात्रा के बीच के समय को नाद का काल कहा जाता है

 नाद क दो भेद है
1. आहत नाद
2. अनाहत नाद
 आहत नाद
              आहत नाद से अभिप्राय उस नाद से हे जब नाद किसी प्रकार क घर्षण या टकराव द्वारा या फिर किसी
वस्तु में वायु के  प्रवाह से उतपन्न हो |
जैसे  की हारमोनियम में वायु भरकर स्वरों  के बजाने के  माध्यम से जब वायु को निकला जाता है और तबले पर हथेली व उंगलियों के माध्यम से प्रहार किया जाता है तो जो ध्वनि उतपन्न होती है वह आहात नाद के कारण ही उत्पन्न होती है
अनाहत नाद
                 यह वह नाद है जिसका संगीत से कोई सम्बन्ध नहीं होता यह अपने  आप अर्थात स्वयं ही बिना किसी संघर्ष के ही उत्पन्न  होता है  यह नाद केवल अनुभव ही किया जा सकता है|
 इसका प्रयोग ऋषि मुनियो व योगी पुरुषो क द्वारा  किया जाता है यह नाद मोक्ष  प्राप्ति के साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है , यह वह नाद ह जो हमारे अंदर ही विधमान है  हम जानबूझ करइसे उत्तपन्न नहीं करते
 जैसे यदि हम हाथो द्वारा अपने   कानो को बंद कर ले तो हमे एक हल्की सी ध्वनि लगातार सुनाई देती है ये ध्वनि ये ध्वनि न तो कम होती ह न ही बढ़ती है और न ही कभी बंद होती है यह हर समय उपस्थित रहती है
 यही मनुष्य  के आध्यात्मिक जीवन से सम्बन्धित होती है , इसका संगीत से कोई सम्बन्ध नहीं होता है | इसी को हम अनाहत नाद कहते  है  
  ध्वनि के आधार पर नाद के तीन भेद है
1  नाद का उचा-नीचपन अर्थात तारता
2 नाद का  छोटा-बड़ापन  अर्थात तीव्रता
3  गुण व जाती
1  नाद का उचा-नीचपन
                                इसे तारता (Pitch )भी कहते है जब नाद उत्पन्न होते है तोएक नाद की कम्पन की संख्या दूसरे नाद की कंपन(vibration) की संख्या से अलग होती है जसे सा से ऊँचा रे , व रे से ऊँचा गए ,
                                इन स्वरों में यह  अंतर नाद की कंपन संख्या में जो अंतर् है उसी के कारण ही  होता है सतो  स्वरों की ध्वनियों में अंतर् नाद की इसी विशेषता पर निर्भर करती है
2  नाद का छोटा-बड़ापन :-
                                   नाद की इस विशेषता को हम नाद की प्रबलता या तीव्रता की नाम से  भी जानते  है
जब हम किसी वस्तु पर आघात  करे या किसी वाद्य की तारो को छेड़े तो एक ध्वनि या आवाज  की उत्पत्ति होती है  यदि हम यह कार्य जोर लगा कर करते  है
 तो यह आवाज तेज व अधिक देर तक सुनाई देती है | इसके विपरीत यदि हम यह कार्य हल्के से करते है
 तो यह आवाज पहली की स्थिति में कम उत्पन्न होगी  और कम समय के लिए सुनाई देगी |  यह नाद क छोटे-बड़ेपन के ही कारण होता है  
                                                  
नाद का गुण :-
                   नाद  के गुण से अभिप्राय है की जब हम कोई ध्वनि सुनते है तो हम तुरंत पहचान जाते है कि ये सम्बन्धित व्यकित या वाद्य की आवाज है |यह नाद कि कारण ही होता है  नाद की यह तुरंत पहचने जाने वाली विशेषता ही नाद का गुण कहलाती है
                  

थाट



 

थाट की रचना सात स्वरों के माध्यम से रागो की उत्पत्ती के लिए की गयी थी,थाट को मेल भी कहा जाता है
हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति में पंडित विष्णु नारायण भारतखण्डे जी ने ऐसी 10 थाटो को बताया है इन दस
थाटो के माध्यम से अनेक रंजक रागो की रचना की जा सकती है
ये 10 थाट निम्नलिखित है
बिलावल:-
              इस थाट में सभी स्वर शुद्ध होते है (सा रे ग म प ध नि )
 
कल्याण थाट:-
              इस में सभी स्वर शुद्ध होते है परन्तु म तीव्र (म ) होता है

खमाज थाट:-
              इस थाट में ( नि ) कोमल होता है और बाकी सब स्वर शुद्ध होते है

भैरव थाट:-
              इस थाट में (रे ) कोमल स्वर लिए जाते है और बाकि स्वर शुद्ध होते है

मरवा थाट:-                                        
              इस थाट में (रे )कोमल तथा (म )तीव्र  होते है और बाकि स्वर शुद्ध होते है

काफी थाट:-
              इस थाट में ( , नि )कोमल स्वर होते है और अन्य शुद्ध स्वर होते है

भैरवी थाट:-
              इसमें (रे , , , नि ) स्वर कोमल होते है और न्यू शुद्ध स्वर होते है

पूर्वी थाट:-
              इस थाट में (रे, )कोमल और (म )तीव्र होता है

तोड़ी थाट:-
              इस थाट में (रे )कोमल और (म )तीव्र होता है

आसावरी थाट:-
              इस थाट में (,,नि) स्वर कोमल होते है और अन्य स्वर शुद्ध होते है

श्रुति

श्रुति वह संगीत उपयोगी नाद है जो एक दूसरे से अलग व स्पष्ट सुनी जा सके |
जैसा कि हम  पिछले  अध्याय में पढ़ चुके है कि ध्वनि कि एक नियमित आंदोलन संख्या को हम नाद कहते  है , संगीत उपयोगी नाद से ही स्वर बनते है परन्तु हम सभी नादो को हम स्वर तो नहीं कह सकते क्योकि ध्वनि में उत्पन्न कंपन में एक मात्रा से दूसरी मात्रा तक असंख्य नाद उत्पन्न होती है
और यदि हम नाद को स्वर कि तो स्वरों की संख्या सात नहीं असंख्य हो जाएगी अतःइस समस्या क समाधान के लिए प्राचीन काल में संगीतज्ञों ने कुछ विशेष मुख्य नाद चुने  जिनकी संख्या 22 मानी गयी | वे नाद जो अपनी स्थान पर स्पष्ट और एक दूसरे से अलग सुनाई दे उनको श्रुति कहा गया  | और इनको कुछ विशेष एक दूसरे से अलग नाम दिए गए  आगे  इन 22  श्रुति  पर 12 स्वर स्थापित किये गए जो अपनी स्थान पर स्पष्ट सुनाई दे
प्राचीन ग्रंथकारो ने  इन शुद्ध स्वरों की स्थापना अंतिम श्रुति  पर  की थी  और इसी आधार पर एक सप्तक में 22  श्रुतियो में से  कुल 12  स्वर जिनमे सात शुद्ध और 5  कोमल स्वरों को लिया गया | परन्तु आधुनिक समय में इन शुद्ध स्वरों को प्रथम श्रुति पर मन जाने  लगा 

     संस्कृत शब्द 'श्रुति ' श्रु धातु से बना है जिसका अर्थ है सुन्ना | अर्थात श्रुति का अर्थ है  सुना हुआ 
श्रुति ही स्वर की जननी होती  है  श्रुति के द्वारा ही स्वर स्थान व सप्तक बनते है 
                  प्राचीन शास्त्रकरो ने 22  श्रुतियो में से सात श्रुतियो को जो एक दूसरे से कुछ अंतर पर स्थापित थी चुन लिया और उनको स्वरों का नाम दे दिया ,| इस प्रकार एक सप्तक में  प्रत्येक स्वर के मध्य  कुछ श्रुतियो को मना  गया
सा                   रे            ग        म                  प                  ध            नि 
  *    *   *   *   *   *   *   *   *   *   *   *    *   *   *   *   *    *   *   *   *                                                      1      2     3    4     1    2    3    1     2    1    2     3    4     1     2    3   4      1    2    3     1    2
                                           
                                           
`मध्य कालीन युग क ग्रंथकारो ने इन  22 श्रुतियो क आधार पर ही सप्तक और स्वरों की स्थापना  की है 
इन 22  को अलग अलग नाम भी दिए गए  जो इस प्रकार है
1  तीव्रा 
2  कुमुद्धति
3  मन्द्रा
4  छन्दोवती 
5  दयावती  
6  रंजनी
7  रक्तिक
8  रौद्री
9  क्रोधा
10 वज्रिका
11 प्रसारिणी 
12 प्रीती
13 मार्जनी
14 क्षिति
15 रक्तिका
16 संदीपनी
17 आलापिनी
18 मंदति
19 रोहिणी
20 रम्य
21 उग्रा
22 शोभिणी


राग वृंदावनी सारंग




राग - वृंदावनी सारंग
राग - काफी
जाति - औडव-औडव
 वादी - रे
संवादी - प
स्वर - दोनों नि
वर्जित स्वर - ग ध
न्यास के स्वर - रे प सा
समय - दिन का दूसरा प्रहर
 सम प्राकृतिक राग - सूर मल्हार, मेघ मल्हार
आरोह - नि सा, रे म प, नि सा
अवरोह - सां नि प, म रे, सा
पकड़ - नि सा रे म रे प म रे सा
राग वृंदावनी सारंग बहुत ही मधुर और लोकप्रिय राग है इसे केवल सारंग के नाम से भी जाना जाता है इस राग में रे स्वर का बहुत्व मिलता है अर्थात इस स्वर पर अधिक न्यास किया जाता है इसका गायन करते समय आरोह में शुद्ध नि तथा अवरोह में कोमल नि का प्रयोग किया जाता है सारंग के अनेक प्रकार पाए जाते हैं जैसे लंका दहन सारंग, मियां की सारंग, शुद्ध सारंग, मधुमाद सारंग आदि इसके कई प्रकार प्रचलित हैं इसके सभी प्रकारों में रे स्वर का बहुत्व देखने को मिलता है